Swami Vivekananda Chicago Speech and his best oratory skills

Swami Vivekananda (12 January 1863 – 4 July 1902), born as Narendra Nath Datta was an Indian Sage and chief disciple of the 19th-century Sage Ramakrishna. He was a major force in the revival of Hinduism in India, and contributed to the concept of nationalism in colonial India. He populated the concept of Bharat Mata among youth and inspired them to contribute for the freedom struggle and development of India.

Swami Vivekananda’s famous Chicago speech through which he proudly introduced Hinduism at the Parliament of the World’s Religions, Chicago in 1893.

World Parliament Religions, Chicago 1893

Swami Vivekananda’s Speech of the Decade

Regarded as the best speech ever heard by American audience in recent times, it was applauded as speech of the decade by the press. Let us read the content of the speech and what made lasting impression in the minds of Americans.

Swami Vivekananda’s Chicago Speech 27 September 1893

Swami Vivekanand Ji said:

“Sisters and Brothers of America

It fills my heart with joy unspeakable to rise in response to the warm and cordial welcome which you have given us. l thank you in the name of the most ancient order of monks in the world; I thank you in the name of the mother of religions; and I thank you in the name of the millions and millions of Hindu people of all classes and sects. My thanks, also, to some of the speakers on this platform who, referring to the delegates from the Orient, have told you that these men from far-off nations may well claim the honor of bearing to different lands the idea of toleration.I am proud to belong to a religion which has taught the world both tolerance and universal acceptance. We believe not only in universal toleration, but we accept all religions as true.”

Swami Vivekanand Chicago Speech 1893

Swami Vivekanand ji Chicago Speech: I am Proud to be an Indian

“I am proud to belong to a nation which has sheltered the persecuted and the refugees of all religions and all nations of the earth. I am proud to tell you that we have gathered in our bosom the purest remnant of the Israelites, who came to the southern India and took refuge with us in the very year in which their holy temple was shattered to pieces by Roman tyranny. I am proud to belong to the religion which has sheltered and is still fostering the remnant of the grand Zoroastrian nation.

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I will quote to you, brethren, a few lines from a hymn which I remember to have repeated from my earliest boyhood, which is every day repeated by millions of human beings: As the different streams having there sources in different places all mingle their water in the sea, so, O Lord, the different paths which men take through different tendencies, various though they appear, crooked or straight, all lead to thee.”

Swami Vivekanand Religious Leaders

“The present convention, which is one of the most august assemblies ever held, is in itself a vindication, a declaration to the world, of the wonderful doctrine preached in the Gita: Whosoever comes to Me, through whatsoever form, I reach him; all men are struggling through paths which in the end lead to me.”

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Swami Vivekanand ji Chicago Speech: Division of Society

“Sectarianism, bigotry, and its horrible descendant, fanaticism, have long possessed this beautiful earth. They have filled the earth with violence, drenched it often and often with human blood, destroyed civilization, and sent whole nations to despair. Had it not been for these horrible demons, human society would be far more advanced than it is now. But their time is come; and I fervently hope that the bell that tolled this morning in honor of this convention may be the death-knell of all fanaticism, of all persecutions with the sword or with the pen, and of all uncharitable feelings between persons wending their way to the same goal.”

Swami Vivekanand at Chicago Speech

When the speech began with Sisters and Brothers of America… there were 2 minutes of non-stop claps with huge smiles across the hall. During speech too attendees clapped at every sentence. And when the speech ended, the claps and smiles lasted for another 3 minutes. That single speech made Swami Vivekanand a global preacher while he was only popular in India then.

शिकागो में दिए स्वामी विवेकानंद के सम्पूर्ण भाषण (हिंदी संस्करण)

मेरे अमरीकी भाइयों और बहनों! आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया हैं उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा हैं। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूं , धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूं और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूं।

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स्वामी विवेकानंद जी द्वारा भारत की गौरव गाथा

वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूं मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूं जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूं जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत- दोनों की ही शिक्षा दी हैं।

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मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था।

Swami Vivekanand, a Hindu Preacher's Chicago Speech

मैं गर्व का अनुभव करता हूं ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है। भाईयो मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियां सुनाता हूं जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूं और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं: रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥ अर्थात जैसे विभिन्न नदियां भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥

अर्थात जैसे विभिन्न नदियां भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।

स्वामी विवेकानंद जी का शांति सन्देश

सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

अर्थात जो कोई मेरी ओर आता है-चाहे किसी प्रकार से हो-मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।

सभी उत्पीड़नों का अंत करे साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियाँ न होतीं तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया हैं और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूं कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनि हुई है वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का अंत करे।

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पाठकों के लिए नोट: स्वामी विवेकानंद फ्री मेसन से थे। फिर भी, उनकी कुछ शिक्षाएँ जीवन सुधार के पाठ थीं इसलिए हमने उन्हें अपनी साइट में सम्मिलित किया है। सनातन धर्म की मान्यताओं को विकृत करने, यीशु के अस्तित्व को सही ठहराने और उनके कुछ स्व: घोषित चमत्कार सिर्फ उद्धरण के लिए हैं, हम उनका समर्थन नहीं करते हैं। ना ही कोई सजग हिन्दू ऐसा करेगा। वे निश्चित रूप से संदिग्ध हैं और फ्री मेसन जैसे जहरीली गुप्त संस्था में उनके संगत से उनके सारे विचार विश्वास करने लायक नहीं हैं और संदेहास्पद है। पाठक अपने बुद्धी का प्रयोग करे और पढ़े।

Note to Readers: Swami Vivekananda was from Free Masons. Still, some of his teachings were life improvement lessons so we have included them in our site. His other inclinations of distorting Sanatan Dharm beliefs, justifying existence of Jesus and some miracles are just for citations, we do not endorse them. They are definitely suspicious and not trust worthy for his association with evil secret society.

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