अखंड भारत हिन्दू राष्ट्र - akhand bharat hindu rashtra

भारत माँ को अखंड बनाये

इन्द्रेश कुमार के अनुसार सम्भवत: ही कोई पुस्तक (ग्रन्थ) होगी जिसमें यह वर्णन मिलता हो कि इन आक्रमणकारियों ने अफगानिस्तान, (म्यांमार), श्रीलंका (सिंहलद्वीप), नेपाल, तिब्बत (त्रिविष्टप), भूटान, पाकिस्तान, मालद्वीप या बांग्लादेश पर आक्रमण किया। यहां एक प्रश्न खड़ा होता है कि यह भू-प्रदेश कब, कैसे पराधीन हुए और स्वतन्त्र हुए। प्राय: पाकिस्तान व बांग्लादेश निर्माण का इतिहास तो सभी जानते हैं। शेष इतिहास मिलता तो है परन्तु चर्चित नहीं है। सन 1947 में विशाल भारतवर्ष का पिछले 2500 वर्षों में 24वां विभाजन है।

अखंड भारत के निर्माण का संकल्प विश्वशांति कि दिशा में उठाया गया कदम है। भारत प्राचीन काल से विश्वगुरु रहा है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को दिशा निर्देश देता आया है। सनातन व्यवस्था आधुनिक युग में प्रासंगिक है। विश्व के समाज जो नैतिक पतन की और अग्रसर है उनको विनाश से बचाने के लिए अखंड भारत का निर्माण आवश्यक है। आपको इस तथ्य की अनुभूति अखंड भारत के इतिहास को जानकार पता चलेगी।

Contents

अखंड भारत का संकल्प और इतिहास

महान पुरुषो और ज्ञानियो के ‘अखंड भारत’ के निर्माण पर विचार

कभी-कभी ऐसा विचार भी मन में आ सकता है कि जब हमारे श्रध्देय नेताओं ने विभाजन स्वीकार कर लिया तो हमने भी उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। परंतु जरा विचार करें। जितने भी लोगों ने स्वाधीनता के लिए प्रयास किये, उनकी आंखों के सामने अखंड भारत था या खंडित भारत। इसका उत्तर – अखंड भारत

द्वितीय विश्वयुध्द के बाद जर्मनी का विभाजन हो गया। इतनी सख्ती थीं कि अब यह विभाजन सदैव के लिए है ऐसा लगने लगा था परन्तु आज जर्मनी फिर से अपने अखण्ड रूप में है। वियतनाम का एकीकरण हो चुका है।

How Wicked #BritishTerrorism & Traitor Congress Divided our Bharat into 11 countries

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Divisions of India done by british & congress

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अखंड भारत के विषय को आम लोगों के हृदय तक पहुंचाने के लिए निम्न उपाय करने होंगे- -‘अखण्ड भारत स्मृति दिवस’ का आयोजन करना, ताकि युवा पीढी के सामने अखण्ड भारत का सपना बरकरार रहे।

-अखण्ड भारत का चित्र अपने कमरों में लगाना, यह हमारे आंखों के सामने रहेगा जिससे हमारा संकल्प और मजबूत होता रहे।

Akhand Bharat Hindu Rashtra For World Peace

अखंड भारत – महापुरूषों के विचार

मैं स्पष्ट रूप से यह चित्र देख रहा हूं कि भारतमाता अखण्ड होकर फिर से विश्वगुरू के सिंहासन पर आरूढ है।
-अरविन्द घोष

आइये, प्राप्त स्वतंत्रता को हम सुदृढ़ नींव पर खड़ी करें अखंड भारत के लिए प्रतिज्ञाबध्द हों।
-स्वातंत्र्यवीर सावरकर

अखंड भारत मात्र एक विचार न होकर विचारपूर्वक किया हुआ संकल्प है। कुछ लोग विभाजन को पत्थर रेखा मानते हैं। उनका ऐसा दृष्टिकोण सर्वथा उनुचित है। मन में मातृभूमि के प्रति उत्कट भक्ति न होने का वह परिचायक है।
-पंडित दीनदयाल उपाध्याय

पाकिस्तान तो इस्लामी भावना के ही विपरीत है। यह कैसे कहा जा सकता है कि जिन प्रांतों में मुसलमान अधिक है वे पाक हैं और दूसरे सब प्रांत नापाक हैं।
-मौलाना अबुल कलाम आजाद

पश्चाताप से पाप प्राय: धुल जाता है किंतु जिनकी आत्मा को विभाजन के कुकृत्य पर संतप्त होना चाहिए था वे ही लोग अपनी अपकीर्ति की धूल में लोट लगाकर प्रसन्न हो रहे हैं। आइए, जनता ही पश्चाताप कर ले-न केवल अपनी भूलचूक के लिए, बल्कि अपने नेताओं के कुकर्मों के लिए भी।
-डा. राम मनोहर लोहिया

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हम सब अर्थात् भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश इन तीनों देशों में रहने वाले लोग वस्तुत: एक ही राष्ट्र भारत के वासी हैं। हमारी राजनीतिक इकाइयां भले ही भिन्न हों, परंतु हमारी राष्ट्रीयता एक ही रही है और वह है भारतीय।
-लोकनायक जयप्रकाश नारायण

पिछले चालीस वर्ष का इतिहास इस बात का गवाह है कि विभाजन ने किसी को फायदा नहीं पहुंचाया। अगर आज भारत अपवने मूल रूप में अखंडित होता तो न केवल वह दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बन सकता था, बल्कि दुनिया में अमन-चैन कायम करने में उसकी खास भूमिका होती।
-जिए सिंध के प्रणेता गुलाम मुर्तजा सैयद

मुझे वास्तविक शिकायत यह है कि राष्ट्रवादी मुसलमानों के प्रति न केवल कांग्रेस अपितु महात्मा गांधी भी उदासीन रहे। उन्होंने जिन्ना एवं उनके सांप्रदायिक अनुयायियों को ही महत्व दिया। मुझे पूरा विश्वास है कि यदि उन्होंने हमारा समर्थन किया होता तो हम जिन्ना की हर बात का खंडन कर देते और विभाजनवादी आंदोलन के आरंभ काल में पर्याप्त संख्या में मुसलमानों को राष्ट्रवादी बना देते।
-न्यायमूर्ति मोहम्मद करीम छागला

अखंड भारत का इतिहास

हरिभक्त के पाठको के अनुरोध पर हम वेबदुनिया द्वारा प्रेषित अखंड भारत का इतिहास यहां प्रदर्शित कर रहे है।

अखंड भारत का इतिहास लिखने में कई तरह की बातों को शामिल किया जा सकता है। सर्व प्रथम तो उसकी निष्पक्षता के लिए जरूरी है पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर उसके बारे में बगैर किसी भेदभाव के सोचा जाए, जो प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य हो सकता है और जो किसी भी जाति, धर्म और समुदाय से हो सकता है।

भारतीय हो तो यह स्वीकारना जरूरी है कि हम भी भारत के इतिहास के हिस्से हैं। हमारे पूर्वज ब्रह्मा, मनु, ययाति, राम और कृष्ण ही थे। इतिहास में उन लोगों के इतिहास का उल्लेख हो जिन्होंने इस देश को बनाया, कुछ खोजा, अविष्कार किए या जिन्होंने देश और दुनिया को कुछ दिया। जिन्होंने इस देश की एकता और अखंडता को कायम रखा। यहां प्रस्तुत है अखंड भारत के बारे में संक्षिप्त बातें।

सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन। परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥
यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः। एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥ द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।।
– (वेदव्यास, भीष्म पर्व, महाभारत)

हिन्दी अर्थ : हे कुरुनन्दन! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भांति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखाई देता है। इसके दो अंशों में पिप्पल और दो अंशों में महान शश (खरगोश) दिखाई देता है।

अर्थात : दो अंशों में पिप्पल का अर्थ पीपल के दो पत्तों और दो अंशों में शश अर्थात खरगोश की आकृति के समान दिखाई देता है।

आप कागज पर पीपल के दो पत्तों और दो खरगोश की आकृति बनाइए और फिर उसे उल्टा करके देखिए, आपको धरती का मानचित्र दिखाई देखा। यह श्लोक 5 हजार वर्ष पूर्व लिखा गया था। इसका मतलब लोगों ने चंद्रमा पर जाकर इस धरती को देखा होगा तभी वह बताने में सक्षम हुआ होगा कि ऊपर से समुद्र को छोड़कर धरती कहां-कहां नजर आती है और किस तरह की।

संत रामानुजाचार्य ने 11 वी शताब्दी में महाभारत के श्लोक के आधार पर समकाल में विश्व का सर्वप्रथम पृथ्वी का मानचित्र बनाया जो इस प्रकार था।

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World Map is Created by Indians and shown to the world

सर्वप्रथम धार्मिक शासक (हिन्दू) जम्बू द्वीप पर शासन करते थे । फिर उनका शासन घटकर भारतवर्ष तक सीमित हो गया। फिर कुरुओं और पुरुओं की लड़ाई के बाद आर्यावर्त नामक एक नए क्षेत्र का जन्म हुआ जिसमें आज के हिन्दुस्थान के कुछ हिस्से, संपूर्ण पाकिस्तान और संपूर्ण अफगानिस्तान का क्षेत्र था। लेकिन मध्यकाल में लगातार आक्रमण, धर्मांतरण और युद्ध के चलते अब घटते-घटते सिर्फ हिन्दुस्तान बचा है।

यह कहना सही नहीं होगा कि पहले हिन्दुस्थान का नाम भारतवर्ष था और उसके भी पूर्व जम्बू द्वीप था। कहना यह चाहिए कि आज जिसका नाम हिन्दुस्तान है वह भारतवर्ष का एक टुकड़ा मात्र है। जिसे आर्यावर्त कहते हैं वह भी भारतवर्ष का एक हिस्साभर है और जिसे भारतवर्ष कहते हैं वह तो जम्बू द्वीप का एक हिस्सा है मात्र है। जम्बू द्वीप में पहले देव-असुर और फिर बहुत बाद में कुरुवंश और पुरुवंश की लड़ाई और विचारधाराओं के टकराव के चलते यह जम्बू द्वीप कई भागों में बंटता चला गया।

अखंड भारत का इतिहास: एंजिया बना भारत

वैज्ञानिकों की मानें तो लगभग 19 करोड़ साल पहले सभी द्वीपराष्ट्र एक थे और चारों ओर समुद्र था। यूरोप, अफ्रीका, एशिया, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका सभी एक दूसरे से जुड़े हुए थे। अर्थात धरती का सिर्फ एक टुकड़ा ही समुद्र से उभरा हुआ था।

इस इकट्ठे द्वीप के चारों ओर समुद्र था और इसे वैज्ञानिकों ने नाम दिया- ‘एंजिया’। सवाल उठता है कि यह द्वीप कहां था और इस द्वीप पर क्या-क्या था। क्या एंजिया ही बना बाद में एशिया?

वैज्ञानिक खोजों से पता चला कि हिमालय और उसके आसपास के क्षेत्र प्राचीन धरती हैं। पुराणों में कैलाश पर्वत को धरती का केंद्र माना है।कुछ विदेशी वैज्ञानिक इसे ब्रह्माण्ड का केंद्र (axis mundi) मानते है। वैज्ञानिकों अनुसार कैलाश पर्वत के पास स्थित तिब्बत सबसे पुरानी धरती है। तिब्बत को वेद और पुराणों में त्रिविष्टप कहा है जहां सबसे प्राचीन मानव रहते थे।

प्रारंभिक वैदिक काल में कैलाश पर्वत धरती का मुख्य केंद्र हुआ करता था। भौगोलिक दृष्टि से यह स्थान सबसे महत्वपूर्ण है। यह हिमालय का भी केंद्र है। हिमालय की पर्वत श्रेणियां, वादियां, घाटियां और जंगली जानवर प्राचीनतम माने जाते हैं। हालांकि भूवैज्ञानिकों के एक शोध अनुसार आरावली की पहाड़ियां विश्व की सबसे प्राचीन पहाड़ियां मानी गई है, लेकिन तब वह जल में डुबी हुई थी।

इस तरह बनें द्वीप या महाद्वीप : बीसवीं सदी के दौरान, भूवैज्ञानिकों ने प्लेट टेक्टॉनिक सिद्धांत को स्वीकार किया, जिसके अनुसार महाद्वीप पृथ्वी के ऊपरी सतह पर सरकते हैं, जिसे कॉन्टिनेन्टल ड्रीफ्ट कहते हैं।

पृथ्वी की सतह पर सात बड़े और कई छोटे टेक्टॉनिक प्लेट होते हैं और यही टेक्टॉनिक प्लेट्स एक दूसरे से दूर होते हैं, टूटकर अलग होते हैं, जो समय बीतते महाद्वीप बन जाते हैं। इसी कारण से, भूवैज्ञानिक इतिहास से पहले और आज के महाद्वीपों से पहले कई दूसरे महाद्वीप हुआ करते थे।

भूवैज्ञानिक मानते हैं कि महाद्वीपों के निर्माण में ज्वालामुखी, भूकंप के अलावा धरती की घूर्णन और परिक्रमण गति का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

पृथ्वी के अक्ष पर चक्रण को घूर्णन कहते हैं। पृथ्वी पश्चिम से पूर्व दिशा में घूमती है और एक घूर्णन पूरा करने में 23 घण्टे, 56 मिनट और 4.091 सेकेण्ड का समय लेती है। इसी से दिन व रात होते हैं।

पृथ्वी सूर्य के चारों ओर अंडाकार पथ पर 365 दिन, 5 घण्टे, 48 मिनट व 45.51 सेकेण्ड में एक चक्कर पूरा करती है, जिसे उसकी परिक्रमण गति कहते हैं। पृथ्वी की इस गति की वजह से ऋतु परिवर्तन होता है।

अखंड भारत का इतिहास: जम्बूद्वीप

प्राचीनकाल में संपूर्ण धरती में सिर्फ एशिया ही रहने लायक सबसे उत्तम जगह माना गया था। इस एशिया को हिन्दू पुराणों में जम्बूद्वीप कहा गया था। हालांकि इसमें योरप के कुछ हिस्से भी शामिल है।

हिन्दू शब्द की उत्पत्ति इंदु शब्द से हुई है यह इंदू ही इंडस हो गया। इंदु शब्द चंद्रमा का पर्यायवाची शब्द है। आर्य किसी जाती का नहीं बल्कि वैदिक विचारधारा मानने वाले लोगों का नाम था जिसमें सभी जाती के लोग सम्मलित थे जैसे दास, वानर, किन्नर, द्रविड़, सुर, असुर आदि। जो लोग यह कहते हैं कि आर्य बाहर से आए थे उनका ज्ञान सही नहीं है या कि उनमें नफरत और साजिश की भावना है।

हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थान प्रचक्षते॥– (बृहस्पति आगम)

अर्थात : हिमालय से प्रारंभ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है। इसका मतलब हिन्दुस्थान चंद्रगुप्त मौर्य के काल में था लेकिन आज जिसे हिन्दुस्थान कहते हैं वह क्या है? दरअसल यह हिन्दुस्थान का एक हिस्सा मात्र है।

प्राचीन काल में संपूर्ण जम्बू द्वीप पर ही आर्य विचारधारा के लोगों का शासन था। जम्बू द्वीप के आसपास 6 द्वीप थे- प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर। जम्बू द्वीप धरती के मध्य में स्थित है और इसके मध्य में इलावृत नामक देश है। इस इलावृत के मध्य में स्थित है सुमेरू पर्वत।

इलावृत के दक्षिण में कैलाश पर्वत के पास भारतवर्ष, पश्चिम में केतुमाल (ईरान के तेहरान से रूस के मॉस्को तक), पूर्व में हरिवर्ष (जावा से चीन तक का क्षेत्र) और भद्राश्चवर्ष (रूस), उत्तर में रम्यकवर्ष (रूस), हिरण्यमयवर्ष (रूस) और उत्तकुरुवर्ष (रूस) नामक देश हैं।

मिस्र, सऊदी अरब, ईरान, इराक, इसराइल, कजाकिस्तान, रूस, मंगोलिया, चीन, बर्मा, इंडोनेशिया, मलेशिया, जावा, सुमात्रा, हिन्दुस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान का संपूर्ण क्षेत्र जम्बू द्वीप था।

अखंड भारत का इतिहास: जम्बूद्वीप का विस्तार

धरती के सात द्वीप : पुराणों और वेदों के अनुसार धरती के सात द्वीप थे- जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है।

जम्बूद्वीप: समस्तानामेतेषां मध्य संस्थित:,
भारतं प्रथमं वर्षं तत: किंपुरुषं स्मृतम्‌,
हरिवर्षं तथैवान्यन्‌मेरोर्दक्षिणतो द्विज।
रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानुहिरण्यम्‌,
उत्तरा: कुरवश्चैव यथा वै भारतं तथा।
नव साहस्त्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तम्‌,
इलावृतं च तन्मध्ये सौवर्णो मेरुरुच्छित:।
भद्राश्चं पूर्वतो मेरो: केतुमालं च पश्चिमे।
एकादश शतायामा: पादपागिरिकेतव: जंबूद्वीपस्य सांजबूर्नाम हेतुर्महामुने।– (विष्णु पुराण)

जम्बू द्वीप का वर्णन : जम्बू द्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है। जम्बू द्वीप का विस्तार एक लाख योजन है। जम्बू (जामुन) नामक वृक्ष की इस द्वीप पर अधिकता के कारण इस द्वीप का नाम जम्बू द्वीप रखा गया था।

जम्बू द्वीप के 9 खंड थे : इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरि, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। इनमें भारतवर्ष ही मृत्युलोक है, शेष देवलोक हैं। इसके चतुर्दिक लवण सागर है। इस संपूर्ण नौ खंड में इसराइल से चीन और रूस से भारतवर्ष का क्षेत्र आता है।

जम्बू द्वीप में प्रमुख रूप से 6 पर्वत थे : हिमवान, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत और श्रृंगवान।

अखंड भारत का इतिहास: जम्बूद्वीप का विस्तार घटा, बना हिन्दूस्थान – हिन्दुओ का भूखंड

पहले संपूर्ण हिन्दू जाति जम्बू द्वीप पर शासन करती थी। फिर उसका शासन घटकर भारतवर्ष तक सीमित हो गया। फिर कुरुओं और पुरुओं की लड़ाई के बाद आर्यावर्त नामक एक नए क्षेत्र का जन्म हुआ जिसमें आज के हिन्दुस्थान के कुछ हिस्से, संपूर्ण पाकिस्तान और संपूर्ण अफगानिस्तान का क्षेत्र था। लेकिन लगातार आक्रमण (मुस्लिम और ईसाई घुसपैठिये), धर्मांतरण और युद्ध के चलते अब घटते-घटते सिर्फ हिन्दुस्तान बचा है।

यह कहना सही नहीं होगा कि पहले हिन्दुस्थान का नाम भारतवर्ष था और उसके भी पूर्व जम्बू द्वीप था। कहना यह चाहिए कि आज जिसका नाम हिन्दुस्तान है वह भारतवर्ष का एक टुकड़ा मात्र है। जिसे आर्यावर्त कहते हैं वह भी भारतवर्ष का एक हिस्साभर है और जिसे भारतवर्ष कहते हैं वह तो जम्बू द्वीप का एक हिस्सा है मात्र है। जम्बू द्वीप में पहले देव-असुर और फिर बहुत बाद में कुरुवंश और पुरुवंश की लड़ाई और विचारधाराओं के टकराव के चलते यह जम्बू द्वीप कई भागों में बंटता चला गया।

भारतवर्ष का वर्णन : समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में भारतवर्ष स्थित है। इसका विस्तार 9 हजार योजन है। यह स्वर्ग अपवर्ग प्राप्त कराने वाली कर्मभूमि है।

इसमें 7 कुल पर्वत हैं : महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष, विंध्य और पारियात्र।

भारतवर्ष के 9 खंड : इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व और वारुण तथा यह समुद्र से घिरा हुआ द्वीप उनमें नौवां है।

मुख्य नदियां : शतद्रू, चंद्रभागा, वेद, स्मृति, नर्मदा, सुरसा, तापी, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, कृतमाला, ताम्रपर्णी, त्रिसामा, आर्यकुल्या, ऋषिकुल्या, कुमारी आदि नदियां जिनकी सहस्रों शाखाएं और उपनदियां हैं।

तट के निवासी : इन नदियों के तटों पर कुरु, पांचाल, पुण्ड्र, कलिंग, मगध, दक्षिणात्य, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव, पारियात्र, सौवीर, सन्धव, हूण, शाल्व, कोशल, मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण रहते हैं। इसके पूर्वी भाग में किरात और पश्चिमी भाग में यवन बसे हुए हैं।

अखंड भारत का इतिहास: किसने बसाया भारतवर्ष

त्रेतायुग में अर्थात भगवान राम के काल के हजारों वर्ष पूर्व प्रथम मनु स्वायंभुव मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने इस भारतवर्ष को बसाया था, तब इसका नाम कुछ और था।

वायु पुराण के अनुसार महाराज प्रियव्रत का अपना कोई पुत्र नहीं था तो उन्होंने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नीन्ध्र को गोद ले लिया था जिसका लड़का नाभि था। नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम ऋषभ था। इसी ऋषभ के पुत्र भरत थे तथा इन्हीं भरत के नाम पर इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा। हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि राम के कुल में पूर्व में जो भरत हुए उनके नाम पर भारतवर्ष नाम पड़ा। यहां बता दें कि पुरुवंश के राजा दुष्यंत और शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर भारतवर्ष नहीं पड़ा।

इस भूमि का चयन करने का कारण था कि प्राचीनकाल में जम्बू द्वीप ही एकमात्र ऐसा द्वीप था, जहां रहने के लिए उचित वातारवण था और उसमें भी भारतवर्ष की जलवायु सबसे उत्तम थी। मृत्युलोक में सबसे अनुकूल ऋतू, मानव प्रतिरक्षित मौसम, उपजाऊ भूमि और ज्ञान का वैभव भारतवर्ष में ही था।यहीं विवस्ता नदी के पास स्वायंभुव मनु और उनकी पत्नी शतरूपा निवास करते थे।

राजा प्रियव्रत ने अपनी पुत्री के 10 पुत्रों में से 7 को संपूर्ण धरती के 7 महाद्वीपों का राजा बनाया दिया था और अग्नीन्ध्र को जम्बू द्वीप का राजा बना दिया था। इस प्रकार राजा भरत ने जो क्षेत्र अपने पुत्र सुमति को दिया वह भारतवर्ष कहलाया। भारतवर्ष अर्थात भरत राजा का क्षे‍त्र।

सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।
प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत। (वायु ३१-३७, ३८)

जब भी मुंडन, विवाह आदि मंगल कार्यों में मंत्र पड़े जाते हैं, तो उसमें संकल्प की शुरुआत में इसका जिक्र आता है:

।।जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते….अमुक…।।

* इनमें जम्बू द्वीप आज के यूरेशिया के लिए प्रयुक्त किया गया है। इस जम्बू द्वीप में भारत खण्ड अर्थात भरत का क्षेत्र अर्थात ‘भारतवर्ष’ स्थित है, जो कि आर्यावर्त कहलाता है।

।।हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्। तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधा:…।।

* हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है।

जम्बू द्वीप का विस्तार

* जम्बू दीप : सम्पूर्ण एशिया
* भारतवर्ष : पारस (ईरान), अफगानिस्तान, पाकिस्तान, हिन्दुस्थान, नेपाल, तिब्बत, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालद्वीप, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, वियतनाम, लाओस तक भारतवर्ष।

अखंड भारत का इतिहास: आर्यावर्त, आर्यों का निवास स्थान

बहुत से लोग भारतवर्ष को ही आर्यावर्त मानते हैं जबकि यह भारत का एक हिस्सा मात्र था। वेदों में उत्तरी भारत को आर्यावर्त कहा गया है। आर्यावर्त का अर्थ आर्यों का निवास स्थान। आर्यभूमि का विस्तार काबुल की कुंभा नदी से भारत की गंगा नदी तक था। हालांकि हर काल में आर्यावर्त का क्षेत्रफल अलग-अलग रहा।

ऋग्वेद में आर्यों के निवास स्थान को ‘सप्तसिंधु’ प्रदेश कहा गया है। ऋग्वेद के नदीसूक्त (10/75) में आर्यनिवास में प्रवाहित होने वाली नदियों का वर्णन मिलता है, जो मुख्‍य हैं:- कुभा (काबुल नदी), क्रुगु (कुर्रम), गोमती (गोमल), सिंधु, परुष्णी (रावी), शुतुद्री (सतलज), वितस्ता (झेलम), सरस्वती, यमुना तथा गंगा। उक्त संपूर्ण नदियों के आसपास और इसके विस्तार क्षेत्र तक आर्य रहते थे।

वेद और महाभारत को छोड़कर अन्य ग्रंथों में जो आर्यावर्त का वर्णन मिलता है वह भ्रम पैदा करने वाला है, क्योंकि आर्यों का निवास स्थान हर काल में फैलता और सिकुड़ता गया था इसलिए उसकी सीमा क्षेत्र का निर्धारण अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग मिलता है। मूलत: जो प्रारंभ में था वही सत्य है।

अखंड भारत का इतिहास: हिन्दुस्थान कैसे बना

हिन्दुस्थान बनने की कहानी महाभारत काल में ही लिख दी गई थी जबकि महाभारत हुई थी। महाभारत के बाद वेदों को मानने वाले लोग हमेशा से यवन और मलेच्छों से त्रस्त रहते थे। महाभारत काल के बाद भारतवर्ष पूर्णत: बिखर गया था। सत्ता का कोई ठोस केंद्र नहीं था। ऐसे में खंड-खंड हो चला आर्यखंड एक अराजक खंड बनकर रह गया था।

अखंड भारत का इतिहास: आर्यावर्त, आर्यों का निवास स्थान

महाभारत के बाद : मलेच्छ (जैसे मुसलमान, अविकसित, अवैदिक, मांसभक्षी) और यवन लगातार आर्यों पर आक्रमण करते रहते थे। हालांकि ये दोनों ही आर्यों के कुल से ही थे। आर्यों में भरत, दास, दस्यु और अन्य जाति के लोग थे। गौरतलब है कि आर्य किसी जाति का नाम नहीं बल्कि वेदों के अनुसार जीवन-यापन करने वाले लोगों का नाम है। वेदों में उल्लेखित पंचनंद अर्थात पांच कुल के लोग ही यदु, कुरु, पुरु, द्रुहु और अनु थे। इन्हीं में से द्रहु और अनु के कुल के लोग ही आगे चलकर मलेच्छ और यवन कहलाए।

बौद्धकाल में विचारधाराओं की लड़ाई अपने चरम पर चली गई। ऐसे में चाणक्य की बुद्धि से चंद्रगुप्त मौर्य ने एक बार फिर भारतवर्ष को फिर से एकजुट कर एकछत्र के नीचे ला खड़ा किया। बाद में सम्राट अशोक तक राज्य अच्छे से चला। अशोक के बौद्ध पंथ अपनाने से भारत का पतन होना शुरू हुआ।

नए धर्म और संस्कृति के अस्तित्व में आने के बाद भारत पर पुन: आक्रमण का दौर शुरू हुआ और फिर कब उसके हाथ से सिंगापुर, मलेशिया, ईरान, अफगानिस्तान छूट गए पता नहीं चला और उसके बाद मध्यकाल में संपूर्ण क्षे‍त्र में हिन्दुओं का धर्मांतरण किया जाने लगा और अंतत: बच गया हिन्दुस्तान। धर्मांतरित हिन्दुओं ने ही भारतवर्ष को आपस में बांट लिया

सनातनी तथ्यों पे गौर करे तो पाते है कि हाल के पंथ (जैसे इस्लाम, ईसाई) वास्तव में हिन्दू रूपी समुद्र के एक बूँद के समान है। और हिन्दू धर्म से ही इनका सृजन हुआ है, वे अवैदिक है और वेद के प्राचीनता, प्रमाणिकता और सार्थकता को सिद्ध करते है। अगर वेद पथ से भटके तो आप क्या बन सकते है यही सत्य यह म्लेच्छ सिखाते है।

अखंड भारत का इतिहास: महाभारत वर्णित महाजनपद

महाभारत के अनुसार प्राग्ज्योतिष (असम), किंपुरुष (नेपाल), त्रिविष्टप (तिब्बत), हरिवर्ष (चीन), कश्मीर, अभिसार (राजौरी), दार्द, हूण हुंजा, अम्बिस्ट आम्ब, पख्तू, कैकेय, गंधार, कम्बोज, वाल्हीक बलख, शिवि शिवस्थान-सीस्टान-सारा बलूच क्षेत्र, सिंध, सौवीर सौराष्ट्र समेत सिंध का निचला क्षेत्र दंडक महाराष्ट्र सुरभिपट्टन मैसूर, चोल, आंध्र, कलिंग तथा सिंहल सहित लगभग 200 जनपद महाभारत में वर्णित हैं, जो कि पूर्णतया आर्य थे या आर्य संस्कृति व भाषा से प्रभावित थे।

कर्म निर्धारित वर्ण प्रणाली का पालन होता था। इनमें से आभीर अहीर, तंवर, कंबोज, यवन, शिना, काक, पणि, चुलूक चालुक्य, सरोस्ट सरोटे, कक्कड़, खोखर, चिन्धा चिन्धड़, समेरा, कोकन, जांगल, शक, पुण्ड्र, ओड्र, मालव, क्षुद्रक, योधेय जोहिया, शूर, तक्षक व लोहड़ आदि आर्य खापें विशेष उल्लेखनीय हैं।

बाद में महाभारत के अनुसार भारत को मुख्‍यत: 16 जनपदों में स्थापित किया गया। जैन ‘हरिवंश पुराण’ में प्राचीन भारत में 18 महाराज्य थे। पालि साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ ‘अंगुत्तरनिकाय’ में भगवान बुद्ध से पहले 16 महाजनपदों का नामोल्लेख मिलता है। इन 16 जनपदों में से एक जनपद का नाम कंबोज था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार कंबोज जनपद सम्राट अशोक महान का सीमावर्ती प्रांत था। भारतीय जनपदों में राज्याणि, दोरज्जाणि और गणरायाणि शासन था अर्थात राजा का, दो राजाओं का और जनता का शासन था।

भगवान राम के काल 5114 ईसा पूर्व में नौ प्रमुख महाजनपद थे जिसके अंतर्गत उप जनपद होते थे।

ये नौ इस प्रकार हैं:

1.मग

2.अंग (बिहार)

3.अवन्ति (उज्जैन)

4.अनूप (नर्मदा तट पर महिष्मती)

5.सूरसेन (मथुरा)

6.धनीप (राजस्थान)

7.पांडय (तमिल)

8. विन्ध्य (मध्यप्रदेश)

9.मलय (मलावार)

16 महाजनपदों के नाम :

1. कुरु

2. पंचाल

3. शूरसेन

4. वत्स

5. कोशल

6. मल्ल

7. काशी

8. अंग

9. मगध

10. वृज्जि

11. चे‍दि

12. मत्स्य

13. अश्मक

14. अवंति

15. गांधार

16. कंबोज

उक्त 16 महाजनपदों के अंतर्गत छोटे जनपद भी होते थे।

अखंड भारत का इतिहास: जम्बूद्वीप विघटन समय सारणी

वेद, रामायण, महाभारत, गीता और कृष्ण के समय के संबंध में मेक्समूलर, बेबेर, लुडविग, हो-ज्मान, विंटरनिट्स फॉन श्राडर आदि सभी तथाकथित विदेशी विद्वानों ने भ्रांतियां फैलाईं और उनके द्वारा किए गए भ्रामक प्रचार का हमारे यहां के इतिहासकारों ने भी अनुसरण किया और भगवान बुद्ध के पूर्व के संपूर्ण काल को इतिहास से काटकर रख दिया। भगवान बुद्ध के पूर्व और बौद्ध काल में भी अखंड भारत में 16 जनपदों के आर्य राजाओं का ही राज था। प्राचीन भारत का अधिकतर इतिहास महाभारत में दर्ज है, जिसमें 16 महान राजाओं का जिक्र है।

भारत वर्ष के इतिहास से ही आधुनिक ब्रह्मांडीय विज्ञान का विकास हुआ है

**विश्व इतिहासकारो द्वारा माना हुआ और एवं अनुमानित समय सारणी नि‍म्नलिखित है:

1.ब्रह्म काल : (सृष्टि उत्पत्ति से प्रजापति ब्रह्मा की उत्पत्ति तक)
2.ब्रह्मा काल : (प्रजापति ब्रह्मा, विष्णु और शिव का काल)
2.स्वायम्भुव मनु काल : (प्रथम मानव का काल 9057 ईसा पूर्व से प्रारंभ)
4.वैवस्वत मनु काल : (6673 ईसा पूर्व से) :
5.राम का काल : (5114 ईस्वी पूर्व से 3000 ईस्वी पूर्व के बीच) :
6.कृष्ण का काल : (3112 ईस्वी पूर्व से 2000 ईस्वी पूर्व के बीच) :
7.सिंधु घाटी सभ्यता का काल : (3300-1700 ईस्वी पूर्व के बीच) :
8.हड़प्पा काल : (1700-1300 ईस्वी पूर्व के बीच) :
9.आर्य सभ्यता का काल : (1500-500 ईस्वी पूर्व के बीच) :
10.बौद्ध काल : (563-320 ईस्वी पूर्व के बीच) :
11,मौर्य काल : (321 से 184 ईस्वी पूर्व के बीच) :
12.गुप्तकाल : (240 ईस्वी से 800 ईस्वी तक के बीच) :
13.मध्यकाल : (600 ईस्वी से 1800 ईस्वी तक) :
14.अंग्रेजों का औपनिवेशिक काल : (1760-1947 ईस्वी पश्चात)
15. स्वतंत्र और विभाजित भारत का काल : (1947 से प्रारंभ)

**हिन्दू ग्रंथो के अनुसार यह तर्क सांगत नहीं है। पर विश्व इसी संख्या वर्णन को मानता है।

एक समय था जबकि वेद संपूर्ण मानव जाति के ग्रंथ थे, लेकिन आज वे केवल हिन्दुओं के लिए हैं। विश्व का नैतिक, आर्थिक और वैचारिक पतन तब शुरू हुआ जब अनेको पंथ अपने ग्रंथो का निर्माण कर वेद के विपरीत अनुशरण करने लगे।

अखंड भारत का इतिहास: जल प्रलय और धरती का परिवर्तन

जल प्रलय ने बदला धरती का इतिहास : जल प्रलय ने धरती की भाषा, संस्कृति, सभ्यता, धर्म, समाज और परंपरा की कहानी को नए सिरे से लिखा। इस जल प्रलय के कारण राजा मनु को एक नाव बनाना पड़ी और फिर वे उस नाव में लगभग 6 माह तक रहे और अंत में वे तिब्बत की धरती पर उतरे। वहीं से वे जैसे जैसे जल उतरने लगा उन्होने पुन: भारत की भूमि को रहने लायक बनाया।

राजा मनु को ही हजरत नूह माना जाता हैं– माना जाता है कि नूह ही यहूदी, ईसाई और इस्लाम के पैगंबर हैं। इस पर शोध भी हुए हैं। जल प्रलय की ऐतिहासिक घटना संसार की सभी सभ्‍यताओं में पाई जाती है। बदलती भाषा और लम्बे कालखंड के चलते इस घटना में कोई खास रद्दोबदल नहीं हुआ है। मनु की यह कहानी यहूदी, ईसाई और इस्लाम में ‘हजरत नूह की नौका’ नाम से वर्णित की जाती है।

इंडोनेशिया, जावा, मलेशिया, श्रीलंका आदि द्वीपों के लोगों ने अपनी लोक परम्पराओं में गीतों के माध्यम से इस घटना को आज भी जीवंत बनाए रखा है। इसी तरह धर्मग्रंथों से अलग भी इस घटना को हमें सभी देशों की लोक परम्पराओं के माध्यम से जानने को मिलता है।

नूह की कहानी– उस वक्त नूह की उम्र छह सौ वर्ष थी जब यहोवा (ईश्वर) ने उनसे कहा कि तू एक-जोड़ी सभी तरह के प्राणी समेत अपने सारे घराने को लेकर कश्ती पर सवार हो जा, क्योंकि मैं पृथ्वी पर जल प्रलय लाने वाला हूँ।

सात दिन के उपरान्त प्रलय का जल पृथ्वी पर आने लगा। धीरे-धीरे जल पृथ्वी पर अत्यन्त बढ़ गया। यहाँ तक कि सारी धरती पर जितने बड़े-बड़े पहाड़ थे, सब डूब गए। डूब गए वे सभी जो कश्ती से बाहर रह गए थे, इसलिए वे सब पृथ्वी पर से मिट गए। केवल हजरत नूह और जितने उनके साथ जहाज में थे, वे ही बच गए। जल ने पृथ्वी पर एक सौ पचास दिन तक पहाड़ को डुबोए रखा। फिर धीरे-धीरे जल उतरा तब पुन: धरती प्रकट हुई और कश्ती में जो बच गए थे उन्ही से दुनिया पुन: आबाद हो गई।

मनु की कहानी– द्रविड़ देश के राजर्षि सत्यव्रत (वैवस्वत मनु) के समक्ष भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में प्रकट होकर कहा कि आज से सातवें दिन भूमि जल प्रलय के समुद्र में डूब जाएगी। तब तक एक नौका बनवा लो। समस्‍त प्राणियों के सूक्ष्‍म शरीर तथा सब प्रकार के बीज लेकर सप्‍तर्षियों के साथ उस नौका पर चढ़ जाना। प्रचंड आँधी के कारण जब नाव डगमगाने लगेगी तब मैं मत्स्य रूप में बचाऊंगा।

तुम लोग नाव को मेरे सींग से बांध देना। तब प्रलय के अंत तक मैं तुम्‍हारी नाव खींचता रहूंगा। उस समय भगवान मत्स्य ने नौका को हिमालय की चोटी ‘नौकाबंध’ से बांध दिया। भगवान ने प्रलय समाप्‍त होने पर वेद का ज्ञान वापस दिया। राजा सत्‍यव्रत ज्ञान-विज्ञान से युक्‍त हो वैवस्‍वत मनु कहलाए। उक्त नौका में जो बच गए थे उन्हीं से संसार में जीवन चला।

तौरात, इंजिल, बाइबिल और कुरआन से पूर्व ही मत्स्य पुराण लिखा गया था, जिसमें उक्त कथा का उल्लेख मिलता है। यह मानव जाति का इतिहास है न कि किसी धर्म का। HB: ज्ञात रहे विश्व में हिन्दू धर्म ही सनातनी है बाकि सब पंथ है जो पीछे जनम लिए हुए मानवो ने या उनके अनुयायियों ने गठित किया। इसीलिए केवल हिन्दू धर्म ही धर्म है बाकी सब पंथ है। रिलिजन और धर्म एक नहीं है।

म्लेच्छों के इतिहास ही नहीं अपितु पंथिक परंपराये भी हूबहू हिन्दू संस्कृति का अनुकरण करती है। आंशिक फेर बदल कर के आज भी काबा में कुछ हद तक वैदीक परम्पराओ का पालन हो रहा है

अखंड भारत का इतिहास: भारत ही है विश्व के सभी सभ्यताओं का सृजक

भारत देश का प्राचीन नाम ‘अजनाभ खंड’ था। अजनाभ खंड का अर्थ ब्रह्मा की नाभि या नाभि से उत्पन्न। बाद में इसके नाम संशोधित होते रहे। लेकिन वेद-पुराण और अन्य धर्मग्रंथों के साथ वैज्ञानिक शोधों का अध्ययन करें तो पता चलता है कि मनुष्य व अन्य जीव-जंतुओं की वर्तमान आदि सृष्टि (उत्पत्ति) हिमालय के आसपास की भूमि पर हुई थी जिसमें तिब्बत को इसलिए महत्व दिया गया क्योंकि यह दुनिया का सर्वाधिक ऊँचा पठार है। हिमालय के पास होने के कारण पूर्व में भारत वर्ष को हिमवर्ष भी कहा जाता था।

वेद-पुराणों में तिब्बत को त्रिविष्टप कहा गया है। महाभारत के महाप्रस्थानिक पर्व में स्वर्गारोहण में स्पष्ट किया गया है कि तिब्बत हिमालय के उस राज्य को पुकारा जाता था जिसमें नंदनकानन नामक देवराज इंद्र का देश था।

पूर्व में यह धरती जल प्रलय के कारण जल से ढँक गई थी। कैलाश, गोरी-शंकर की चोटी तक पानी चढ़ गया था। इससे यह सिद्ध होता है कि संपूर्ण धरती ही जलमग्न हो गई थी, लेकिन विद्वानों में इस विषय को लेकर मतभेद हैं। कुछ का मानना है कि कहीं-कहीं धरती जलमग्न नहीं हुई थी। पुराणों में उल्लेख भी है कि जलप्रलय के समय ओंकारेश्वर स्थित मार्कंडेय ऋषि का आश्रम जल से अछूता रहा। जलप्रलय को नाकारा नहीं जा सकता, हाल के उत्तराखण्ड में हुए जलप्रलय को कौन भूल सकता है।

कई माह तक वैवस्वत मनु (इन्हें श्रद्धादेव भी कहा जाता है) द्वारा नाव में ही गुजारने के बाद उनकी नाव गोरी-शंकर के शिखर से होते हुए नीचे उतरी। गोरी-शंकर जिसे एवरेस्ट की चोटी कहा जाता है। दुनिया में इससे ऊँचा, बर्फ से ढँका हुआ और ठोस पहाड़ दूसरा नहीं है।

तिब्बत में धीरे-धीरे जनसंख्या वृद्धि और वातावरण में तेजी से होते परिवर्तन के कारण वैवस्वत मनु की संतानों ने अलग-अलग भूमि की ओर रुख करना शुरू किया। हाल का विज्ञान मानता है कि पहले सभी द्वीप इकट्ठे थे। अर्थात अमेरिका द्वीप इधर अफ्रीका और उधर चीन तथा रूस से जुड़ा हुआ था। अफ्रीका भारत से जुड़ा हुआ था। धरती की घूर्णन गति और भू-गर्भीय परिवर्तन के कारण धरती द्वीपों में बँट गई।

इस जुड़ी हुई धरती पर ही हिमालय की निम्न श्रेणियों को पार कर मनु की संतानें कम ऊँचाई वाले पहाड़ी विस्तारों में बसती गईं। फिर जैसे-जैसे समुद्र का जल स्तर घटता गया वे और भी मध्य भाग में आते गए। राजस्थान की रेगिस्तान इस बाद का सबूत है कि वहाँ पहले कभी समुद्र हुआ करता था। दक्षिण के इलाके तो जलप्रलय से जलमग्न ही थे। लेकिन बहुत काल के बाद धीरे-धीरे जैसे-जैसे समुद्र का जलस्तर घटा मनु का कुल पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी मैदान और पहाड़ी प्रदेशों में फैल गए।

जो हिमालय के इधर फैलते गए उन्होंने ही अखंड भारत की सम्पूर्ण भूमि को ब्रह्मावर्त, ब्रह्मार्षिदेश, मध्यदेश, आर्यावर्त एवं भारतवर्ष आदि नाम दिए। जो इधर आए, वे सभी मनुष्य विदेशी आक्रांताओ द्वारा आर्य कहलाने लगे  –  जबकि तथा कथित आर्य स्थानांतरगमन और आक्रमण एक कोरी कल्पना है। विदेशियों द्वारा संबोधित आर्य संप्रदाय  भारत वर्ष के ही है और रहे है।। आर्य  एक गुणवाचक शब्द है जिसका सीधा-सा अर्थ है श्रेष्ठ

इन आर्यों के ही कई गुट अलग-अलग झुंडों में पूरी धरती पर फैल गए और वहाँ बस कर भाँति-भाँति के धर्म और संस्कृति आदि को जन्म दिया। मनु की संतानें ही आर्य-अनार्य में बँटकर धरती पर फैल गईं। पूर्व में यह सभी देव-दानव कहलाती थीं।

श्रीराम शर्मा आचार्य (गायत्री शक्ति पीठ) बताते है “भारतीय पुराणकार सृष्टि का इतिहास कल्प में और सृष्टि में मानव उत्पत्ति व उत्थान का इतिहास मवन्तरों में वर्णित करते हैं। और उसके पश्चात् मन्वन्तरों का इतिहास युग-युगान्तरों में बताते हैं।”

“प्राचीन ग्रन्थों में मानव इतिहास को पाँच कल्पों में बाँटा गया है:

(1). हमत् कल्प 1 लाख 9 हजार 8 सौ वर्ष विक्रमीय पूर्व से आरम्भ होकर 85800 वर्ष पूर्व तक

(2). हिरण्य गर्भ कल्प 85800 विक्रमीय पूर्व से 61800 वर्ष पूर्व तक, ब्राह्म कल्प 60800 विक्रमीय पूर्व से 37800 वर्ष पूर्व तक

(3). ब्राह्म कल्प 60800 विक्रमीय पूर्व से 37800 वर्ष पूर्व तक

(4). पाद्म कल्प 37800 विक्रम पूर्व से 13800 वर्ष पूर्व तक

(5). वराह कल्प 13800 विक्रम पूर्व से आरम्भ होकर इस समय तक चल रहा है।

अब तक वराह कल्प के स्वायम्भु मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तमास मनु, रेवत-मनु चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वन्तर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णि मनु की अन्तर्दशा चल रही है। सावर्णि मनु का आविर्भाव विक्रमी सम्वत प्रारम्भ होने से 5630 वर्ष पूर्व हुआ था।”

भारत के सनातन वेद की प्राचीनतम मानते हुए, गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स ने कल्प को समय का सर्वाधिक लम्बा मापन घोषित किया है

त्रिविष्टप अर्थात तिब्बत या देवलोक से वैवस्वत मनु के नेतृत्व में प्रथम पीढ़ी के मानवों (देवों) का मेरु प्रदेश में अवतरण हुआ। वे वेद का ज्ञान साथ लाये थे। इसी से श्रुति और स्मृति की परम्परा चलती रही। वैवस्वत मनु के समय ही भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार हुआ

वैवस्वत मनु की शासन व्यवस्था में देवों में पाँच तरह के विभाजन थे: देव, दानव, यक्ष, किन्नर और गंधर्व

वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे। इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध पुत्र थे। इसमें इक्ष्वाकु कुल का ही ज्यादा विस्तार हुआ। इक्ष्वाकु कुल में कई महान प्रतापी राजा, ऋषि, अरिहंत और भगवान हुए हैं। इक्ष्वाकु कुल के रघुवंश में ही प्रभु श्री राम जी का अवतार हुआ

अखंड भारत एक हिन्दू राष्ट्र होगा। हिन्दू राष्ट्र हिन्दू परंपरा का निर्वहन करते हुए विश्व को शांतिमय बनाने का प्रयास है। इस सत्य को जानने के लिए हिन्दू धर्म के सार को समझे।

Hindu Dharm based Hindu Rashtra

या फिर अंग्रेजी के इस लेख को पढ़े – Are All Citizens of This World a Hindu

आंशिक संपादन: हरिभक्त, अखंड भारत का इतिहास लेखन: अनिरुद्ध जोशी

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Comments

  1. PREETESH KUMAR says:

    नमस्ते,
    उपर्युक्त लेख में कुछ त्रुटियाँ हैं:
    1) अभी वैवस्वत मन्वंतर के लगभग १२ करोड वर्ष ही व्यतीत हुए हैं, जबकि लेख में वर्त्तमान वैवस्वत मन्वन्तर का बीतना लिखा है.
    2) स्वायम्भुव मनु का काल 1 अरब 96 करोड वर्ष पूर्व का है, किन्तु लेख में वैवस्वत मनु से कुछ हज़ार वर्ष पहले का लिखा है.

    ३) ब्रह्मा, स्वायम्भुव मनु, वैवस्वत मनु, श्रीराम आदि का अनुमानित समय सारणी तो पूरा गलत है….

    1. Jai Shree Krishn Preetesh ji,

      Crores of years are for humans but for DevLoks it runs into thousands of years. Replication is done on interpretation of ancient texts. Your observation is right.

      There are some history in numericals which is accepted by foreign nationals. You are 100% right however sometimes to convince the opposite viewers we have to accept their anomalies to cut the debate to core agenda. We have highlighted the same in the article, thanks for astute observation and comment.

      Jai Shree Krishn

  2. Piyush soni says:

    अखंड भारत का सपना साकार हो कर ही रहेगा , अाचा्य चाणक्य की भी यही pratigya थी,
    अोर यह साकार भी हुई थी,
    हम सभी काे मिलकर इसे साकार करना है,
    जय माँ भारती

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